
कल रात दस बजे ग्राम गोगेपुर जिला शाहजहाँपुर से एक किसान का फोन आया कि गोगेपुर में प्राचीन शिव मंदिर के पास एक घायल गाय को कई दिन हो गये पड़े और अब कुत्ते नोच रहे हैं। किसी गौ रक्षक को सूचित करिये मदद हो जाये. . सच पूंछो तो गाय की यह हालत सुन बहुत बुरा फील हुआ कि गऊवंशों का जीवन बड़ा नरक बना दिया गया है। धर्म रक्षकों के संगठनात्मक बोल राम के नारों से मंच और चौराहे गूंजते हैं। मगर गऊं गंगा और बेटियों के जो आज बद से बदतर हालात रुह कंपाने वाले होते हैं जब खबर मिलती है तो विरह वेदना उत्पन्न होती है।
किसान को समझाया कि भाई आप गांव वाले ही उस गाय की घायल अवस्था में मदद करिये जो भी हो सके देसी इलाज करिये. .उसे किसी कपड़े या झूल से ढांक दीजिये कुत्ते न नोच पायें। मगर वो किसान हारा थका परेशान छुट्टा गायों से तंग बोला कि भाई गांव में कौन सेवा करे जबसे सरकार ने गाय को छुट्टा कराया है रात दिन खेतों पर रखवाली को रहते और घर में भी कोई बीमार हो जाये तो गांव में झोलाछाप डाक्टर से ही दवा गोली ले फिर खेत पर आ जाते हैं. .शहर कस्बा आयें तो लौटने पर खेत तो मिलेगा मगर खेत में खड़ी फसल नहीं. .इस तरह किसान का दर्द गाय के दर्द को गुमराह करता रहा। अंत में यादृच्छिक रुप से गाय की पीड़ा को भी दूर करने की गुहार किसान की आह में थी। जो बार बार गऊ रक्षकों को भेजकर गाय उठवाने की बात भी दोहराता रहा।
मित्रों आज गऊ गंगा और बेटियों को बचाने के लिये किसी पेशेवर और विज्ञापित संगठनों की जरुरत नहीं बल्कि मानवतावादी सोच को पैदा करने की जरुरत है. .क्योंकि गऊवंश पालने से, और गंगा को मां मानने से तथा बेटियों को पढ़ाने से तथा सरकार को इनके आयोग बनाने से यह सब समाज में सनातन सुरक्षित होंगे। न कि भ्रष्टाचार को गौशाला बनाकर इन दुधारु औषधीय गाय जीवन को भूखे प्यासे घेरकर बंधुआ बनाकर मरने के लिये घेरना है। जहां एक ओर सरकार आयुर्वेदिकता पर आयुष केंद्रों का ढिंडोरा पीट रही बड़ा बजट खपा रही है तो वहीं आयुष को जिंदा रखने वाली देसी औषधीय गाय का दूध जर्सी बना रही है तो दूसरी ओर विदेशों की थाली में बीफ परोसती सरकार मोटा पैसा कमाकर. .गाय का जीवन ही नहीं मानव जीवन को भी दूध से दूर कर खतरे में डाल रही है।
आज जो दूध दस रुपये के पैकट में पान के खोखे पर भी मिलता है और तीन महिने तक खराब नहीं होता वो दूध नहीं जीवन छोटा करने और जवानी में हार्टअटैक जैसे मामले बढ़ रहे हैं. .क्योंकि दूध की नदियां भारत में सूख चुकी हैं और आर्टिफिशियल दूध बाजार में किसी बोरी पेटी में पैक लेने को कोई कमंडल नहीं ले जाना पड़ता।
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