आज समाज में जब कोई व्यक्ति यदि रंजिशन भी आपस में लड़ता है तो वह किसी न किसी पार्टी समुदाय जातीय समिति विभाग ठेके से जुड़ा होने के कारण दो चार व्यक्तियों का झगड़ा उनकी स्टेटस रुपी मानसिकता से उस समूह समुदाय पार्टी नेता समिति जाति धर्म का बन जाता है जो समर्थकतावाद का निंदनीय व घातक विचार समाज के आचरणीय व्यवहार व उसकी संस्क्ृति को बनकर साबित हो रहे हैं जिस से वह जुड़ा है।मैं लेखक हूं जो दयावान और ज्ञान की अभिलाषा रखता हूं समाज के उन समस्त जीवों के प्रति जो मेरी नजर मेरे अनुभव में आते हैं। जिनका समाज की रुप रेखा बनाये रखने में सहयोग है हमारा ध्यान वहीं पर रहता है। मैं यह पहले स्वीकार कर लेता हूं कि मैं आलोचक हूं लेकिन समाज का नहीं किसी धर्म जाति का नहीं बस इनको चलाने वाले अयोग्य बेईमान क्रूर हिंसक जातिय धर्मी सत्ता लोभियों का जो समाज की आरक्षित सोच पर इनकी ठेकेदारी प्रथा हावी हैं ,उनका विचारात्मकता से घोर विरोधी हूं अगर उनका स्टेटस् माफियाई है और विचार सामाजिकताई है तो मैं उनके विचारों का अनुयायी हूं,पीछे नहीं हटता सहयोग विचार तक सीमित रखता हूं। मैं हमेशा उन दलित बच्चों की मदद करता हूं जो शिक्षा के प्रति जागरुक होते हैं और उन्हें अपनी संस्क्ृति से वाफिक कराता हूं जो दया धर्म के मूल तत्व हैं मानव और समाज की संरचना में।इसलिये मैं अक्सर उन लोगों को यह दिखाता हूं कि मैं दलित को कामयाब और आप उनकी जाति का ठेका लेकर उन्हें अपने स्टेट्स अपनी पहचान को कबाब बनाते खाते हैं न कि उनको नबाब बनाते हो। इसलिये मैं उन जातिय धर्मी ठेकेदारों को वही आईना दिखाता हूं जिनमें उनके दलितवादिता और हिन्दू मुस्लिम वांचते गुण दशा दिखाई देते हैं मजबूरन दलित या मुस्लिम कहकर जबकि वह समाज में मानव जाति के द्योतक और हमारे आस पास की सम्बन्धित विचारधारा जो सहयोगार्थ एक नदी के दो किनारों की तरह निरंतर धारा को प्रवाहित रखने के लिये एक दूसरे के विपरीत बहते रहते हैं जब यही किनारे भटक जाते हैं अपने मार्ग से कट कर तो सैलाब लाते हैं जैसा कि सामाजिक धर्म विचारों की जीवनधारा मे होता है। अब हम वहीं पहुंचते हैं जहां पर आजका आदमी समितियों से लैस है जो समाज के संवैधानिक नियमों को फालो करने पर लड़ते झगड़ते और फिर समूह संगठन बन इकट्ठे होते हैं जो उनके शिक्षित होने पर भी उनकी अयोग्यता पर सवाल उठाती है जब वह हिंसक तौर पर बात समझने समझाने के तरीके पर लट्ठमार भाषा में सामने आते हैं। क्योंकि उदर भरने मात्र की व्यवसायिक शिक्षा आधुनिकता तो ला सकती लेकिन वैदिकता नहीं। समाज में उदर भरने की शिक्षा एक अराजकतावादी भयावह हालातों की जननी मंचों पर एक समिति का प्लान बनकर अपना स्टेटस् बनाने के लिये सत्यमेव जयते का नारा जपते हुये आपके बीच सरकारी निजी सत्ता शासन की चाहत रखने वाले ही समितियों के ठेकेदार हैं ना कि समाज की रुप रेखा तय करने वाले हैं। इसीलिये समाज में अराजकता फैली है अर्थव्यवस्था कमजोर है आदमी दुखी है। हम जब तक सामाजिक नियमों को समानता में लाकर कड़ाई से उनका पालन नहीं करेंगे तब तक देश समाज का कुछ नहीं हो सकता सिवाय स्टेट्स बनाने बिगाड़ने के जिसका चलन समाज में बड़ा है।
बाबा
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