कलम के आइने से


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दोस्त की फरमाइश पे ......

परिंदा था अपने शहर का

आज नुमाइंदा हो गया

गया जो सबकुछ छोड़ के

खंडर वो मेरा सब हो गया

पाया बहुत कुछ भागते सफर में

सफर में ही मेरा जीवन खो गया

सोचता हु लौट आऊ अपने डगर में

छलकते आशु ओस बन के

मेरी खंडर जमी पे बह गया

यादों के आइने से बरबस

हर पल बाहर आ रही थी

दिल कह उठा चल लौट चले

वापस अपने आशियाने में

बेबस दिल जवाबदारियों

की कहानियां कह गया

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